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जया पार्वती व्रत की कथा और इसका धार्मिक महत्व
July 3, 2020 • जयंती एक्सप्रेस • aastha/Jyotish

पौराणिक कथा के अनुसार चिरकाल में कौडिन्य नगर में वामन नामक ब्राह्मण रहता था जिसकी पत्नी का नाम सत्या था। दोनों बेहद खुश थे। हालांकि दोनों की कोई संतान नहीं थी।

हिंदी पंचांग के अनुसार, आषाढ़ माह में शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को जया पार्वती व्रत शुरू होता है, जो सावन महीने के कृष्ण पक्ष की तृतीया को समाप्त होता है। तदनुसार, इस बार जया पार्वती व्रत शुक्रवार 3 जुलाई से शुरू होकर बुधवार 8 जुलाई को समाप्त होगा। इस दौरान मां पार्वती की पूजा-उपासना की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि जया पार्वती व्रत करने से सौभाग्य में वृद्धि और संतान प्राप्ति होती है। आइए, इस व्रत की कथा और महत्व जानते हैं-

जया पार्वती व्रत की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, चिरकाल में कौडिन्य नगर में वामन नामक ब्राह्मण रहता था, जिसकी पत्नी का नाम सत्या था। दोनों बेहद खुश थे। हालांकि, दोनों की कोई संतान नहीं थी। एक दिन महर्षि नारद उनके आश्रम पर पहुंचे तो उन्होंने ब्राह्मण दंपत्ति को चिंतित देखकर उनकी चिंता का कारण जानना चाहा। तब उन्होंने संतान प्राप्ति के उपाय बताने को कहा।

उसके बाद, नारद जी ने उन्हें भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने की सलाह दें। महर्षि नारद जी के वचनानुसार, उन्होंने शिव जी और माता पार्वती की पूजा की, लेकिन एक दिन ब्राह्मण वामन को मंदिर के सामने सांप ने डस लिया, जिससे वामन की मृत्यु हो गई। इसके पश्चात, सत्या रोने लगी और माता पार्वती को स्मरण करने लगी। सत्या की भक्ति से प्रसन्न होकर माता पार्वती ने ब्राह्मण वामन को पुनर्जीवित कर दिया।

इसके बाद माता पार्वती ने दंपत्ति से वर मांगने को कहा। तब ब्राह्मण दंपत्ति ने पुत्र प्राप्ति की कामना की। उस समय माता पार्वती ने उन्हें जया पार्वती व्रत करने की सलाह दी। कालांतर में ब्राह्मण दंपत्ति ने विधि पूर्वक माता पार्वती की पूजा उपासना की, जिसके फलस्वरूप ने उन्हें पुत्र रत्न  की हुई। इस व्रत का पुण्य प्रताप वट सावित्री व्रत के समतुल्य होता है। यह व्रत पांच दिनों तक किया है।